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Monday, March 30, 2009

आर्थिक मंदी और जी - २०

संसार भर मे आर्थिक मंदी की चर्चा जोरो पर हैं अभी तक राम - वाण के रूप मे जो उपाय हुए हैं उनके नतीजे संतोष जनक इसलिए नही लगे क्योकि दुनिया के अमीरों को वे रास नही आयें हैं पूंजीवादी संसार उपायों को नापसंद नही कर रहा हैं पर उससे सहमत भी नही हैं पैसा अपनी जो कीमत लगा रहा हैं वह सरकारों और उभोक्ताओ को स्वीकार्य नही हैं क्योकि इतनी कीमत चुकाने का अर्थ एक नए सामाजिक और आर्थिक असंतुलन को जन्म देना होगा जिसके लिए बाकी दुनिया तैयार नही हैं दूसरी ओर सारे फायदे के बाद भी दूसरो की कमाई मुफ्त मे हड़प लेने के फिराक मे लगे पूजी - जगत , अपने ऊपर दुनिया को और आश्रित बनाने के लिए , दुनिया की अन्य व्यवस्था को कंगाल बनने का संकल्प किए बैठा लग रहा हैं इसलिए हर बार अपनी लाचारी का रोना रो कर दुनिया की सहानभूति अपने पक्ष मे करने के लिए कोई कसर बाकी नही छोड़ रहा हैं और अपने मकसद को कामयाब बनाने के लिए अपनी नाकामयाबी का डर दिखा कर शेष दुनिया के सामने एक ऐसी तस्वीर रखने की कोशिश कर का रहा हैं की उसके बिना आर्थिक जगत विकल्प हीन हैं . आर्थिक मंदी का भय दिखाकर , आर्थिक विकास को यथावत बनाए रखने के लिए , आर्थिक रूप से सशक्त देशो मे जिस तरह से जन-धन का उपयोग का उपयोग सरामायेदारों के पक्ष मे किया गया हैं उतनी पूंजी से कई देशो की गरीबी और भूखमरी मिट सकती थी ।
जी २० की लन्दन बैठक भी दुनिया की कुल पूंजी का ८६% हिस्सा पर काबिज मुल्को की महफ़िल हैं जहा दौलत की रंगीनियों मे मदहोश दुनिया अमीरी के अगुवा देश आर्थिक मंदी से निकालने की राह निकालने की कोशिश करेगे वैसे यहाँ यह याद करना लाज़मी हैं कि जैसे - जैसे जी ग्रुप के देशो से सबध्द देशो की संख्या बढ़ रही हैं वैसे - वैसे दुनिया मे आर्थिक असमानता की खाई चौड़ी होती जा रही हैं दुनिया के चाँद पर भले पड़े गए हो पर दुनिया की खूबसूरती को एक तरीके से स्थायी ग्रहण लग चुका हैं .दुनिया भले ही राहत की आस लगाये बैठी हो पर वहा जो तय होना हैं वह एकदम साफ़ हैं कि अमीर और अमीरी कैसे बनाये रखी जाये . और इस एकसूत्रीय एजेंडे से संसार तो दूर जी - २० के देशो के गरीबो का भी भला नही होना हैं । क्योकि अतीत गवाह हैं जब भी दुनिया की अमीरी के बादशाह एक जूट हुए हैं गरीबो का संकट बढ़ा ही हैं अगर उदारीकरण , वैश्वीकरण , विश्वव्यापार समझौता , मुक्त - व्यापार की संधियों और विश्व बैंक ,अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के कर्ज से तरक्की हुई होती तो आर्थिक -मंदी आयी कहा से हैं ?और हालत यहाँ तक कैसे जा पहुचे जब , एक देश को चावल - गोदामों पर छापे तक डालने पड़ गए, ताकि पूंजी के दंश से नागरिको को बचाया जा सके , इतना ही नही जिस तरह से १९९९ के बाद से दुनिया के गरीबो के जीवन - स्तर मे गिरावट आयी हैं वह भी बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देती हैं सच्चाई तो यह हैं कि , गरीब चाहे कही के भी हो किसी भी देश के हो ,किसी भी मजहब को मानने वाले हो दुनिया की खुशिया तेजी के साथ उनके हाथो से निकलती जा रही हैं.
जी २० के देश अगर अपने और अमीरी के हितों से ऊचे उठकर , गरीबी की ओर भी उसी दृष्टि से देखे जिससे अपनी दुनिया देखते हैं तो निश्चित रूप से दुनिया मे वह बदलाव आ सकेगा कि दुनिया सचमुच अन्तरिक्ष की सबसे हसीन और सबसे रंगीन दुनिया बन जायेगी .